Tuesday, 15 November 2016

हिन्दी भाषा का सम्मान वापस लाना जरूरी है- अखिलेश यादव


यूपी के सीएम अखिलेश यादव ने बाल दिवस के मौके पर लखनऊ के हिंदी संस्थान में साहित्यकारों को सम्मानित किया है। मुख्यमंत्री ने सुभद्रा कुमारी चौहान महिला बाल साहित्य सम्मान से डॉक्टर शशि लाल गोयल को सम्‍मानित किया। डॉक्टर अजय जन्मेजय को सोहनलाल द्विवेदी बाल कविता सम्मान से सम्‍मानित किया गया। जावेद आलम शम्सी को शिक्षार्थी को बाल चित्रकला सम्मान से सम्मानित किया गया। डॉ निस्चल को लल्ली प्रसाद पांडे को बाल साहित्य पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित किया गया।  लायकराम को रामकुमार वर्मा को बाल नाटक सम्मान से सम्‍मानित किया गया।  अरविंद मिश्रा को जगत पुरी चतुर्वेदी बाल विज्ञान लेखन सम्मान से सम्मानित वहीं, शादाब आलम को उमाकांत मालवीय युवा बाल साहित्य सम्मान दिया गया।

हम चाहे जितने बड़े हो जाएं, थोड़ा बचपना बचा रहना चाहिए। अगर बचपना खत्म हो गया तो हम उसी दिन बूढ़े हो जाएंगे। यह बात मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने हिंदी संस्थान के यशपाल सभागार में सोमवार को कही। वह उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की ओर से बाल साहित्यकारों के सम्मान समारोह में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। 

उन्होंने कहा कि आज के दौर में बाल साहित्यकारों को समझना होगा। बच्चों की भाषा बदल रही है, बच्चे टीवी चैनल पर जो देख रहे हैं, वहीभाषा बोल रहे हैं। बच्चों के बीच ऐसा साहित्य आना चाहिए, जो हमारी परंपराओं और संस्कृति से भरा हो। उन्होंने साहित्यकारों को प्रतीक चिह्न और 51 हजार रुपये की धनराशि देकर सम्मानित किया।
 
बाल साहित्य से मिलते हैं संस्कार
समारोह की शुरुआत दया चतुर्वेदी और उनके सहयोगियों ने वाणी वंदना की संगीतमयी प्रस्तुति से की।इसके बाद अखिलेश यादव ने बाल साहित्यकारों को बाल साहित्यकार सम्मान 2015 से नवाजा।
समाजवादियों ने किया प्रोत्साहित
सम्मानित साहित्यकारों को बधाई देते हुए सीएम बोले कि समाजवादियों ने हमेशा साहित्य और साहित्यकारों को प्रोत्साहित किया है,लेकिन सूबे में ऐसी भी सरकार सत्ता में आयी थी, जिसने हिन्दी संस्थान के सम्मानों को ही बंद करवा दिया। 
आने वाले समय में बाल साहित्यकारों की सम्मान राशि को बढ़ाकर दोगुना किया जाएगा। नेताजी सहित सभी समाजवादियों का मानना रहा है कि बिना हिन्दी भाषा के विकास के देश की तरक्की और खुशहाली संभव नहीं है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में अंग्रेजी जरूरी है, लेकिन सरकारों को सोचना पड़ेगा कि कैसे हिन्दी का सम्मान वापस आए।



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